माँ तो माँ होती है

माँ तो माँ होती है - माँ पर शायरी पहली बार किसी गज़ल को पढ़कर आंसू आ गए । 
शख्सियत ए “लख्ते-जिगर” कहला न सका । जन्नत के धनी “पैर” कभी सहला न सका । दुध पिलाया उसने छाती से निचोड़कर, मैं “निकम्मा, कभी 1 ग्लास पानी पिला न सका। बुढापे का “सहारा हूँ “अहसास” दिला न सका पेट पर सुलाने वाली को “मखमल, पर सुला न सका । वो “भूखी, सो गई “बहू, के “डर से , एकबार मांगकर मैं “सुकुन के “दो, निवाले उसे खिला न सका । नजरें उन “बुढी, “;आंखों से कभी मिला न सका । वो “दर्द, सहती रही में खटिया पर तिलमिला न सका । जो हर “जीवनभर” “ममता, के रंग पहनाती रही मुझे उसे, ईद/होली पर दो जोड़ी, कपडे सिला न सका । बिमार बिस्तर से उसे “आराम दिला न सका । “खर्च के डर से उसे बड़े अस्पताल, ले जा न सका । “माँ” ने बेटा कहकर “दम,तौडने के बाद से अब तक सोच रहा हूँ, “दवाई, इतनी भी ” महंगी, न थी के मैं ला ना सका ।
माँ तो माँ होती है भाईयों माँ अगर कभी गुस्से मे गाली भी दे तो उसे उसकी “दुआ” समझकर भूला देना चाहिए
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