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लहजे याद रखता हूँ

मैं लोगों से मुलाक़ातों के लम्हे याद रखता हूँ,मैं बातें भूल भी जाऊं तो लहजे याद रखता हूँ,ज़रा सा हट के चलता हूँ ज़माने की रवायत से,जो सहारा देते हैं वो कंधे हमेशा याद रखता हूँ |

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मैं तेरा मुंतज़िर हूँ

मैं तेरा मुंतज़िर हूँ मुस्कुरा के मिल कब तक तुझे तलाश करूँ अब आ के मिल यूं मिल के फिर जुदाई का लम्हा न आ सके जो दरमियाँ में है सभी कुछ मिटा के मिल

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खूबसूरत लम्हें

गुज़र जाते हैं …..खूबसूरत लम्हें …. यूं ही मुसाफिरों की तरह….यादें वहीं खडी रह जाती हैं ….. रूके रास्तों की तरह…एक “उम्र” के बाद “उस उम्र” की बातें” उम्र भर” याद आती हैं..पर “वह उम्र” फिर “उम्र भर” नहीं आती..।